Knowledge

poorvaabhyaasen tenaiv hriyate hyavashopi sa Shlok Meaning, Bhavarth, Anuvaad

 🕉श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक स्वाध्याय 🕉

 [अध्याय 6 – ध्यानयोग ]

श्र्लोक ४४

पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि स:।

जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥

शब्दार्थ:-

(सः) वह पथभ्रष्ट साधक 

(अवशः) स्वभाव वश विवश हुआ

 (अपि) भी

 (तेन) उस 

(पूर्वाभ्यासेन) पहलेके अभ्यास से 

(एव) ही वास्तव में 

(ह्रियते) आकर्षित किया जाता है

 (हि) क्योंकि 

(योगस्य)परमात्मा की भक्ति का 

(जिज्ञासुः) जिज्ञासु 

(अपि) भी 

(शब्दब्रह्म) परमात्मा की भक्ति विधि जो सद्ग्रन्थों में वर्णित है उस विधि अनुसार साधना न करके पूर्व के स्वभाव वश विचलित होकर उस वास्तविक नाम का जाप न करके प्रभु की वाणी रूपी आदेश का 

(अतिवर्तते) उल्लंघन कर जाता है। 

क्योंकि पूर्व स्वभाववश फिर विचलित हो जाता है।

 इसीलिए गीता अध्याय 7 श्लोक 16-17 में जिज्ञासु को अच्छा नहीं कहा है केवल ज्ञानी भक्त जो एक परमात्मा की भक्ति करता है वह श्रेष्ठ कहा है। गीता अध्याय 18 श्लोक 58 में भी प्रमाण है।

अनुवाद:- 

 वह (यहाँ ‘वह’ शब्द से श्रीमानों के घर में जन्म लेने वाला योगभ्रष्ट पुरुष समझना चाहिए।) श्रीमानों के घर में जन्म लेने वाला योगभ्रष्ट पराधीन हुआ भी उस पहले के अभ्यास से ही निःसंदेह भगवान की ओर आकर्षित किया जाता है तथा समबुद्धि रूप योग का जिज्ञासु भी वेद में कहे हुए सकाम कर्मों के फल को उल्लंघन कर जाता है।

Facebook Comments
error: Content is protected !!