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 🕉श्रीमद्भगवद्गीता दैनिक स्वाध्याय 🕉

 [अध्याय 6 – ध्यानयोग ]

श्र्लोक ४०

श्रीभगवानुवाच |

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते |

न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥40॥

शब्दार्थ (पार्थ) हे पार्थ! (वास्तव में वास्तव में पथ भ्रष्ट साधक (न) न तो (इह) का बैक्टीरिया (न) न (अमुत्रा) वहां का शिशु है। (तस्य) उसका (विनाशः) ही (विद्याते) गो (हि) निसंदेह (कश्चित) कोई भी व्यक्ति जो (न कल्याणकारी) शब्द स्वांस तक मराडा से आत्म कल्याण के लिए कर्मयोगी है जो योग भ्रष्ट है। है (तात) हे प्रिय तो (दुर्गतिम्) दुर्गति को (गच्छति) गुण प्राप्त है। श्लोक का प्रमाण अध्याय 4 श्लोक 40 में भी। भावार्थ: – गीता जी ने इस श्लोक में 40 में लिखा है m M वह योग तो मन वश है। श्लोक 40 का यह अर्थ लगाना है कि यह गलत है या नहीं। अध्याय 6 श्लोक 42 से 44 तक भविष्य में प्रमाणिक है। मानव जन्म के समय दुर्लभ दुर्लभ हैं। मानव जन्म प्राप्त होने के बाद पूर्वाभ्यास करने से पहले मनमाना व्यवहार गुण रोगाणु नष्ट हो जाएगा अच्छा है। इसलिए श्लोक 40 का वाक्य वाक्य है अध्याय 6 श्लोक 45 में भी स्पष्ट है। उदाहरण:- जड़ भरत नाम के योगी का एक हिरण के संतों में जाने से धार्मिक मार्ग से भ्रष्ट होने से हिरण का जन्म प्राप्त और दुर्गति को प्राप्त होगा।

अनुवाद:- श्री गोकुल बोल- हे पार्थ! उस पुरुष न तो इस लोक में नाश है और न परलोक में ही हे प्रेम! आत्मबोध के लिए भगवत्प्राप्ति के लिए कर्म करने वाला कोई भी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता है।

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